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प्रतिबिंब: जल में सजी प्रकृति की कविता

  • लेखक की तस्वीर: Raj Dahal
    Raj Dahal
  • 4 मई 2025
  • 2 मिनट पठन


लेखक: राज कुमार | श्रेणी: प्रकृति कविता | भाषा: हिन्दी


प्रकृति हमारी आत्मा का दर्पण होती है। जब हम उसकी गोद में बैठते हैं, तो भीतर की हलचल भी शांत होने लगती है। आज की कविता "प्रतिबिंब" एक ऐसे शांत, हरे-भरे द्वीप की कल्पना से जन्मी है, जो जल के बीचोंबीच स्थित है और अपने ही प्रतिबिंब में डूबा हुआ है। यह कविता केवल प्रकृति का दृश्य चित्रण नहीं करती, बल्कि हमारे भीतर की यात्रा का भी प्रतीक है।


कविता: प्रतिबिंब


जल के बीच, एक हरा-भरा द्वीप,

गुलमोहर के लाल-नारंगी फूलों से सजा,

जैसे प्रकृति ने अपना आंचल फैला दिया हो।

हरियाली की चादर, ओढ़े, वह खड़ा है,

शांत जल में, अपनी छवि देखता,

समय की लय में, थिरकता है।


जल शांत, प्रतिबिंब बनाता,

द्वीप की सुंदरता, उसमें उतर आती,

जैसे जीवन की कहानी, समय में अंकित।

हर पत्ता, हर फूल, हर पेड़,

अपनी गाथा कहता, बिना बोले,

प्रकृति के संगीत में, मिल जाता।


सफेद पक्षी, पंख फैलाए,

उड़ने की तैयारी में, आज़ादी का एहसास देते,

याद दिलाते कि जीवन में भी, उड़ान भरने की जरूरत है।

वे, प्रकृति के सच्चे यात्री,

द्वीप पर विश्राम करते,

फिर आकाश की ओर, उड़ान भरते।


पर पीछे, नगर की इमारतें, चकाचौंध भरी,

प्रकृति के सामने, मामूली सी लगती,

जैसे सभ्यता की चमक, प्रकृति के सामने फीकी है।

इस टकराव में, एक संदेश छिपा,

कि प्रकृति सदा अमर रहेगी,

मानव निर्मित सौंदर्य, अस्थायी है।


इस चित्र में, एक कहानी बयां होती,

प्रकृति और सभ्यता के बीच की,

एक सदाबहार सौंदर्य की गवाही।

हमें याद दिलाती, वापस लौटने की,

प्रकृति की गोद में, जहां शांति है,

और जीवन का सच्चा सौंदर्य छिपा है।


कविता के पीछे की प्रेरणा


इस कविता की प्रेरणा एक सुंदर छवि से मिली — एक द्वीप जो गुलमोहर के फूलों से सजा है, और जिसके चारों ओर शांत जल फैला है। उस जल में द्वीप की छवि प्रतिबिंबित होती है, जैसे कोई आत्मा स्वयं को पहचान रही हो। यह कविता जीवन की गति, प्रकृति की स्थायित्व और मानव सभ्यता के अस्थायी स्वरूप पर एक चिंतन है।


अंतिम विचार


"प्रतिबिंब" केवल एक कविता नहीं, एक भावनात्मक अनुभव है। यह हमें रोक कर सोचने को मजबूर करती है — क्या हम अपने जीवन में उस द्वीप की तरह कभी रुकते हैं? क्या हम कभी अपने ही प्रतिबिंब को देख पाते हैं?


यदि यह कविता आपके मन को छू गई हो, तो इसे साझा करें और दूसरों को भी प्रकृति की गोद में ले चलें।


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